अट्ठारहवीं शताब्दी के अंन्त में, ईस्ट इंडिया कंपनी ने स्वयं अपने बल पर एक गन पाउडर फैक्टरी की स्थापना करने का निश्चय किया। उन्होंने इसके लिये ऐसे स्थान का चुनाव किया जहाँ पर डच ऑस्टेन्ड कंपनी ने सन 1712 से 1744 तक गन पाउडर फैक्टरी चलाई थी। यह चुनी गई भुमि सन 1769 महाराजा नबकिशन बहादुर के अधीनस्थ थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस भुमि को प्राप्त करने के लिए महाराजा के साथ 'एक्सचेंज सेट्लमेंट' किया।

    महाराजा तथा युनाइटेड कंपनी के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के द्वारा 28 अप्रैल 1778 को एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए गये। महाराजा के इस्टेट के नोआपाड़ा तथा कुछ अन्य गाँवों के बद्ले कंपनी ने उन्हें कोलकाता स्थित कुछ गाँवों सूतालोटी बाजार, सुबह बाजार, चार्ल्स बाजार और बाग बाजार इत्यादि की ताल्लुक्दारी प्रदान की।

    फैक्टरी के मुख्यद्वार पर लगे हुए संगमरमर के फलक से ज्ञात होता है कि 1787 के दौरा जे फक्र्युहर, एजेन्ट के निर्देशन में गन पाउडर फैक्टरी,  ईशापुर को स्थापित करने का कार्य आरंभ हुआ। जनवरी 1791 से उत्पाद्न आरंभ हुआ तथा तथाकथित 1 जुन 1902 तक 100 वर्षों से भी अधिक समय तक चलता रहा।

    दिनांक 8 जुलाई 1901 के स्टेट्समैन समचारपत्र की संपादकीय टिप्पणी से ज्ञात होता है कि इन्डियन ऑर्डनेन्स डिपार्टमेन्ट के कैप्टन मूर को उन दिनों बर्मिंघम के समीप स्पार्कब्रुक स्थित फैक्टरी की रूपरेखा के अनुसार ईशापुर में वार्षिक रूप से 25000 राइफलों और कार्बाइनों के उत्पाद्न के लिए सुविधाएं स्थापित करने का काम सौंपा गया। इस हेतु फैक्टरी स्थापित करने के लिए गन पाउडर फैक्टरी का स्थान चुना गया। काम पुरा हो जाने पर परकटत सितम्बर 1904 से उत्पादन आरंभ हो गया। फैक्टरी का फिर से 'राइफल फैक्टरी ईशापुर' के रूप में नामकरण किया गया।

    इस फैक्टरी की तुलना लंडन के उत्तर में स्थित उपनगर एनफील्ड लॉक स्थित रॉयल स्माल आर्म फैक्टरी से की जा सकती है जहाँ पर प्रसिद्ध एनफिल्ड राइफल सृजित की गई और जो लघु शस्त्रों के डिजाइन, विकास, उत्पादन  और परीक्षण का केन्द्र रहा है। दोनों स्थानों में भौगोलिक और अन्य समानताओं के आधार पर सही ही ईशापुर को 'भारत का एनफील्ड' कहा गया। तबसे ही आर एफ आई का लघु शस्त्रों के क्षेत्र में लम्बा प्रयाण आरंभ हुआ और अपनी इस गौरवयात्रा के दौरान आर एफ आई के खुखरी, तलवार, बोनेट, रिवाल्वर, पिस्टल, कार्बाइन, मस्कट, बजुका रॉकेट लाँचर, 7।62 एस एल आर इशापुर राइफल, 9 एम एम स्वचालित पिस्तौल, और 5.56 इन्सास इत्यादि विविध प्रकार के लघु शस्त्रों का निर्माण किया और भारतबर्ष में लघु शस्त्रों के उत्पादन के क्षेत्र में अपनी अमिर छाप छोड़ी।

    प्रथम एवं द्बितीय विश्वयुद्ध के दौरान फैक्टरी ने युद्ध की जरुरतें पुरा करने के लिए .303 बोल्ट सेक्शन राइफलों का प्रचुर संख्या में उत्पादन किया। उसके अलावा मैक्सिम, लेविस, हॉचकिस एवं वाइकर्स इत्यादि हल्की मशीन गनों का मरम्मत कार्य भी किया गया।

    वर्ष 1920 में अप्रेन्टिस प्रशिक्षण की योजना आरंभ आर्डनेन्स फैक्टरियां के पर्यवेक्षकीय कैडर के भारतीयकरण की दिशा में कदम उठाया गया। आयुध निर्माणियों में तकनीकि प्रशिक्षण की दिशाअ में अग्रगामी आर्डनेन्स ट्रेनिंग स्कूल ने कामगार तथा पर्यवेक्षकीय स्तरों पर भर्ती किए गए युवा जनों को प्रशिक्षण प्रदान किया।

    स्वतंत्रता के बाद सैन्य सेवाओं से मिलने वाले कार्यभार में कभी के कारण फैक्टरी को अपनी उत्पादन गतिविधियों विविधता का समावेश करना पड़ा। मानवशक्ति को काम में लगाए रख़ने के लिए फैक्टरी ने नागरिक शस्त्रों (सिविल विपन) के डिजाइन एवं विकास का काम हाथ में लिया। 12 बोर डी बी बी एल एवं एस बी वीपन शॉट गनों का वर्ष 1953 में उत्पादन आरंभ किया गया। वर्ष 1956 में .315" स्पोर्टिंग राइफल का उत्पादन प्रतिस्थापित किया गया। आज भी नागरिक बाजार में इस शस्त्र की बहुत अच्छी मांग है।

    1962 में थलसेना की उभरती जरुरतों को पुरा करने के लिए फैक्टरी  से 7.62 एम एम अर्धसंचालित राइफल का उत्पादन स्थापित करने के लिए कहा गया। कार्य को पुरा करने में महान सफलता प्राप्त हुई और तत्कालीन रक्षा नेत्री ने संसद में इस असाधारण कार्यनिस्पादन के लिए निर्माणी की प्रशंसा की। कम से कम संभव समय में 7.62 एम एम ईशापुर राइफल की डिजाइन एवं विकास का काम पुरा किया गयाअ और 1964-65 के प्रभाव से नियमित उत्पादन आरंभ हो गया। फैक्टरी की इस उपलब्धि को मान्यता देते हुए भारत सरकार ने तत्कालीन निर्माणी महाप्रबंधक श्री के सी बनर्जी को पदम्श्री प्रदान की।

    सातवें और आठवें दशक में फैक्टरी ने 106 एम एम आर सी एल के लिए सबकेलिबर गन तथा 105 टैंक गन और 84 एम एम रॉकेट लाँचर का सफलतापूर्वक उत्पादन किया। फैक्टरी के वर्ष 1977 में मेंढको एम एम स्वचालित पिस्तौल का सफलतापूर्वक उत्पादन स्थापित किया। इसका उत्पादन आज तक जरी है।

    वर्ष 1994 में 5.56 एम एम इन्सास राइफल का शृंखलाबद्ध उत्पादन आरंभ किया गया। निर्माणी द्वारा ए आर डी ई की सहभागिता से समकालीन अंतर्राष्ट्रीय मानक के अनुरूप राइफल विकसित की गई। भारत के प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 1997 में निर्माणी को डी आर डी ओ तेकनोलॉजी असिमिलेशन पुरस्कार प्रदान किया गया।

    वर्ष 1999 में आर एफ़ आई ने नागरिक क्षेत्र के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर की .22" स्पोर्टिंग राइफल का उत्पादन विकसित कर स्थापित किया। स्वयं शोध एवं  अनुसंधान द्वारा आर एफ आई ने वर्ष 2001-02 में नागरिक क्षेत्र के लिए 0.22 रिवाल्वर विकसित की और वहाँ उसकी भारी माँग है।

    पिछ्ले कुछ समय में लागत को कश रखने के लिए बहतर उच्च स्तरीय मानक बनाए रखने और उत्पादन तकनीक अपनाते हुए उत्पादन क्षेत्र में नवीनतम टेकनोलॉजी का समवेश कर फैक्टरी को आधुनिकीकृत किया गया है। उत्पाद प्रक्रिया की डिजाइन के लिए कैड/कैम की व्यवस्था की गई है। वर्तमान में आर एफ आई आई एस ओ - 9002 प्रमाणित कम्पनी है। इसकी रासायनिक और धातु प्रोयोगशाला अब एन ए बी एल प्रमाणित है। अत्याधुनिक टेकनोलॉजी, कुशल मानवशक्ति और सर्वोत्तम उत्पादन प्रक्रियाओं के कारण इस फैक्टरी को आयुध निर्माणी संगठ्न के मुकुट की मणि समझा जाता है।

 

क्लॉक टॉवर

गन पाउडर फैक्टरी (वर्तमान में राइफल फैक्टरी ईशापुर) के पुराने धातु स्टोर परिसर पर 1869 में 3x3 मीटर ऑधार तथा 29.6 मीटर उँचाई का क्लॉक टॉवर बनाया गया था। क्लॉक टॉवर  की विशेषता यह कि लोग फैक्टरी के भीतर और बाहर से समय देख सकते है।
 

 

मुख्य द्वार

1907 में मात्र रू 26,898/- की लागत से बनाया गया वर्तमान मुख्य द्वार, जिसकी उँचाई 10.5 मीटर(लगभग) है, रणनीतिक महत्वता है क्योंकि इसका भवन इस प्रकार बनाया गया था कि इसके शिखर से फैक्टरी के भीतर और बाहर का अधिकांश भाग दिखता रहे।


आयुध निर्माणी टेकनिकल स्कूल

किसी भी आयुध निर्माणी मे यह अपने प्रकार का पहला स्कूल था। 1927 मे रु 49005/- की लागत से बनाया गया यह स्कूल विविध ग्रेड के लघु शस्त्रों और उपस्कर के उत्पादन के लिए प्रिसीसन ट्रेड में प्रशिक्षण देने के लिए पुरी तरह सक्षम था। इस स्कूल के पूर्व प्रशिक्षणर्थियों ने आयुध निर्माणी संगठन में प्रमुख स्थिति हासिल की।


ईशापुर क्लब

पुराने ख्यातिलब्ध कुछ नगरी संस्थानों से एक ईशापुर क्लब की स्थापना वर्ष 1905 में कुछ रुपए 4,407/- मात्र की लागत से फैक्टरी और संबद्ध संस्थानों के अधिकारियों के मनोरंजन के लिए की गई थी। किसी भी आधुनिक अद्दवन क्लब की सारी सुविधाएं यहाँ पर थी। लकड़ी की फर्श का बैडमिन्टन कोर्ट जिसे स्प्रिंग द्वारा सपोर्ट दिया गया था और केन्द्रीय गुम्बद जिसमें वृहद आकार के शीशेके फलक लगे थे ताकि आस-पास प्राकृतिक प्रकाश रहे, इस भवन की विशेषताएं है।


प्रोयोगशाला

 


ड्च टॉवर

यह बैरकों से घिरा हुआ ऐतिहासिक विरासत वाला महत्वपूर्ण भवन है। यह भवन 1722 से 1733 के मध्य बनाया गया। भवन की ऐसा आकार दिया गया है कि उसके अंदर का वातावरण कम तापमान वाला रहे। यह ध्यान  देने योग्य बात है कि दीवारों  का झुकाव 22" से 23" के बीच है। इसका प्रोयोग गन पाउडर के लिए मैगजीन के रुप में किया जाता था।